पढने और संकलन का शौक ही इस ब्लॉग का आधार है... महान कवि, शायर, रचनाकार और उनकी उत्कृष्ट रचनाएँ.... हमारे मित्र... हमारे गुरु... हमारे मार्गदर्शक... निश्चित रूप से हमारी बहुमूल्य धरोहर... विशुद्ध रूप से एक अव्यवसायिक संकलन जिसका एक मात्र और निःस्वार्थ उद्देश्य महान काव्य किवदंतियों के अप्रतिम रचना संसार को अधिकाधिक काव्य रसिकों तक पंहुचाना है... "काव्य मंजूषा"

Monday, 11 March 2013

चाँदनी रातें बिखर गयीं

क्या जाने किसी की प्यास बुझाने किधर गयीं |
उस सर पे झूम के जो घटाएं गुज़र गयीं | 

दीवाना पूछता है ये लहरों से बारहा, 
कुछ बस्तियाँ यहाँ थीं बताओ किधर गयीं |

अब जिस तरफ़ से चाहे गुज़र जाए कारवाँ, 
विरानियाँ तो सब मिरे दिल में उतर गयीं | 

पैमाना टूटने का कोई ग़म नहीं मुझको, 
ग़म है तो ये कि चाँदनी रातें बिखर गयीं |

पाया भी उनको खो भी दिया चुप भी हो रहे, 
इक मुख़्तसर सी रात में सदियाँ गुज़र गयीं |


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