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Monday, 11 March 2013

भजन बिनु जीवत जैसे प्रेत

भजन बिनु जीवत जैसे प्रेत।
मलिन मंद मति डोलत घर-घर, उदर भरन के हेत॥
भजन बिनु जीवत जैसे प्रेत।

मुख कटु-बचन नित्त पर निंदा, संगति सुजस न लेत।
कबहुँ पाप करय पावत धन, गाड़ि धूरि तिही देत॥
भजन बिनु जीवत जैसे प्रेत।

गुरु ब्रहमन अरु संत-सुजन के, जात कबहुँ निकेत।
सेवा नहिं भगवंत - चरण की, भवन नील कौं खेत॥
भजन बिनु जीवत जैसे प्रेत।

कथा नहीं गुण-गीत सुजस हरि, सब काहू दुख देत।
ताकी कथा कहाँ सुनि सूरज, बूड़त कुटुंब समेत॥
भजन बिनु जीवत जैसे प्रेत।

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