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Saturday, 9 March 2013

मैं ह्रदय की बात रे मन

तुमुल कोलाहल कलह में
मैं ह्रदय की बात रे मन.

विकल होकर नित्य चंचल,
खोजती जब नींद के पल,
चेतना थक सी रही तब;
मैं मलय की बात रे मन.
तुमुल कोलाहल कलह में
मैं ह्रदय की बात रे मन.

चिर विषाद विलीन मन की,
इस व्यथा के तिमिर वन की,
मैं उषा-सी ज्योति रेखा,
कुसुम विकसित प्रात रे मन;
तुमुल कोलाहल कलह में
मैं ह्रदय की बात रे मन.

जहां मरू ज्वाला धधकती,
चातकी कन को तरसती;
उन्हीं जीवन घाटियों की,
मैं सरस बरसात रे मन.
तुमुल कोलाहल कलह में
मैं ह्रदय की बात रे मन.

पवन की प्राचीर में रुक,
जला जीवन जी रहा झुक;
इस झुलसते विश्व-दिन की,
मैं कुसुम ऋतु रात रे मन.
तुमुल कोलाहल कलह में
मैं ह्रदय की बात रे मन.

चिर निराशा नीरधर में,
प्रतिच्छायित अश्रु-सर में;
मधुप मुखर मरंद मुकुलित,
मैं सजल जलजात रे मन.
तुमुल कोलाहल कलह में
मैं ह्रदय की बात रे मन.
______(कामायनी से)______