पढने और संकलन का शौक ही इस ब्लॉग का आधार है... महान कवि, शायर, रचनाकार और उनकी उत्कृष्ट रचनाएँ.... हमारे मित्र... हमारे गुरु... हमारे मार्गदर्शक... निश्चित रूप से हमारी बहुमूल्य धरोहर... विशुद्ध रूप से एक अव्यवसायिक संकलन जिसका एक मात्र और निःस्वार्थ उद्देश्य महान काव्य किवदंतियों के अप्रतिम रचना संसार को अधिकाधिक काव्य रसिकों तक पंहुचाना है... "काव्य मंजूषा"

Tuesday, 9 October 2012

मेरे नाविक

ले चल वहाँ भुलावा देकर,
मेरे नाविक! धीरे-धीरे!

जिस निर्जन में सागर-लहरी!
अम्बर के कानों में गहरी-
निश्छल प्रेम कथा कहती हो,
तज कोलाहल की अवनी रे!

जहां सांझ सी जीवन छाया, 
ढीले अपनी कोमल काया,
ढीले नयन से ढुलकाती हो,
ताराओं की पांत घनी रे!

जिस गंभीर मधुर छाया में-
विश्व चित्र-पट चल माया में,
विभुता विभु सी पड़े दिखाई 
दुःख-सुखवाली सत्य बनी रे!

श्रम विश्राम क्षितिज बेला से-
जहां सृजन करते मेला से-
अमर जागरण उषा नयन से-
बिखराती हो ज्योति घनी रे!

ले चल वहाँ भुलावा देकर,
मेरे नाविक! धीरे-धीरे!
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