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Monday, 3 September 2012

शबनम की ज़ंजीर

रचना तो पूरी हुई, जान भी है इसमें?
पूंछूं जो कोई बात, मूर्ति बतलाएगी?
लग जाय आग यदि किसी रोज देवालय में
चौंकेगी या यह खड़ी खड़ी जल जायेगी?

ढाँचे में तो सब ठीक-ठीक उतरा, लेकिन, 
बेजान बुतों के कारीगर, कुछ होश करो;
जब तक पत्थर के भीतर सांस नहीं चलती,
सौगंध इसी की तुम्हें, न तुम संतोष करो. 

भर सको अगर तो प्रतिमा में चेतना भरो,
यदि नहीं, निमंत्रण दो जीवन के दानी को. 
विभ्राट महाबल जहाँ थके से दीख रहे,
आगे आने दो वहाँ क्षीणबल प्राणी को. 

तैरता हवा में जो, वह क्या भारी होगा?
सपनों के तो सारथी क्षीणबल होते हैं;
संसार पुष्प से अपने को भूषित करता,
ये गंधभार अपनी आत्मा में ढोते हैं. 

सपनों का वह सारथी, यान जिसका कोमल,
आँखों से ओझल ह्रदय-ह्रदय में चलता है,
जिसके छूते ही मन की पलक उधर जाती,
विश्वास भ्रान्ति को भेद दीप सा बलता है. 

सपनों का वह सारथी, रात की छाया में, 
आते जिस की श्रुति में संवाद सितारों से, 
सरिताएं जिस से अपना हाल कहा करतीं,
बातें करता जो फूलों और पहाड़ों से. 

पपड़ियाँ तोड़ फूटते जिंदगी के सोते,
रथ के चक्के की लीक जहाँ भी पड़ती है.
प्रतिमा सजीव होकर चलने-फिरने लगतीं,
मिटटी की छाती में चेतना उमड़ती है. 

छेनी टांकी क्या करें? जिंदगी की साँसें,
लोहे पर धरकर नहीं बनाई जाती हैं,
धाराएं जो मानव को उद्वेलित करतीं,
यंत्रों के बल से नहीं बहाई जाती हैं. 

विज्ञान काम कर चुका; हाथ उसका रोको;
आगे आने दो गुणी! कला कल्याणी को.
जो भार नहीं विभ्राट, महाबल उठा सके,
दो उसे उठाने किसी क्षीणबल प्राणी को. 

मानव-मन को बेधते फूल के दल केवल,
आदमी नहीं कटता बरछों से, तीरों से;
लोहे की कड़ियों की साज़िश बेकार हुई,
बांधों मनुष्य को शबनम की जंजीरों से.

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