पढने और संकलन का शौक ही इस ब्लॉग का आधार है... महान कवि, शायर, रचनाकार और उनकी उत्कृष्ट रचनाएँ.... हमारे मित्र... हमारे गुरु... हमारे मार्गदर्शक... निश्चित रूप से हमारी बहुमूल्य धरोहर... विशुद्ध रूप से एक अव्यवसायिक संकलन जिसका एक मात्र और निःस्वार्थ उद्देश्य महान काव्य किवदंतियों के अप्रतिम रचना संसार को अधिकाधिक काव्य रसिकों तक पंहुचाना है... "काव्य मंजूषा"

Tuesday, 7 August 2012

उड़ गया हंस


साधो यह तन ठाठ तंबूरे का॥

पाँच तत्व का बना तंबूरा तार लगा नवतूरे का।
साधो यह तन ठाठ तंबूरे का॥

ऐंचत तार मरोरत खूंटी निकसत राग हजूरे का,
टूटा तार बिखर गई खूंटी हो गया धूर मधूरे का।
साधो यह तन ठाठ तंबूरे का॥

या देही का गर्व न कीजै उडि गया हंस तंबूरे का,
क़हत कबीर सुनो भई साधो अगम पंथ कोई सूरे का।
साधो यह तन ठाठ तंबूरे का॥ 

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