पढने और संकलन का शौक ही इस ब्लॉग का आधार है... महान कवि, शायर, रचनाकार और उनकी उत्कृष्ट रचनाएँ.... हमारे मित्र... हमारे गुरु... हमारे मार्गदर्शक... निश्चित रूप से हमारी बहुमूल्य धरोहर... विशुद्ध रूप से एक अव्यवसायिक संकलन जिसका एक मात्र और निःस्वार्थ उद्देश्य महान काव्य किवदंतियों के अप्रतिम रचना संसार को अधिकाधिक काव्य रसिकों तक पंहुचाना है... "काव्य मंजूषा"

Tuesday, 7 August 2012

सौ निर्वाण

मैं अनंत पथ में लिखती जो
सस्मित सपनों की बातें
उनको कभी न धो पाएंगी
अपने आंसू से रातें! 

उड़ उड़ कर जो धूल करेगी
मेघों का नभ में अभिषेक, 
अमिट रहेगी उसके अंचल-
में मेरी पीड़ा की रेख! 

तारों में प्रतिबिम्बित हो
मुस्काएँगी अनंत आँखें, 
होकर सीमाहीन, शून्य में
मंडराएंगी अभिलाषें!

वीणा होगी मूक बजाने-
वाला होगा अंतर्धान,
विस्मृत के चरणों पर आकर
लौटेंगे सौ सौ निर्वाण! 

जब असीम से हो जाएगा
मेरी लघु सीमा का मेल,
देखोगे तुम देव! अमरता 
खेलेगी मिटने का खेल! 

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