पढने और संकलन का शौक ही इस ब्लॉग का आधार है... महान कवि, शायर, रचनाकार और उनकी उत्कृष्ट रचनाएँ.... हमारे मित्र... हमारे गुरु... हमारे मार्गदर्शक... निश्चित रूप से हमारी बहुमूल्य धरोहर... विशुद्ध रूप से एक अव्यवसायिक संकलन जिसका एक मात्र और निःस्वार्थ उद्देश्य महान काव्य किवदंतियों के अप्रतिम रचना संसार को अधिकाधिक काव्य रसिकों तक पंहुचाना है... "काव्य मंजूषा"

Sunday, 5 August 2012

इंसान बनेगा...

तू हिन्दू बनेगा न मुसलमान बनेगा
इंसान की औलाद है इंसान बनेगा. 

अच्छा है अभी तक तेरा कुछ नाम नहीं है,
तुझको किसी मज़हब से कोई काम नहीं है.
जिस इल्म ने इंसान को तक्सीम' किया है,
उस इल्म का तुझ पर कोई इल्ज़ाम नहीं है.
तू बदले हुए वक़्त की पहचान बनेगा.
इंसान की औलाद है इंसान बनेगा. 

मालिक ने हर इंसान को इंसान बनाया,
हमने उसे हिन्दू या मुसलमान बनाया.
कुदरत ने तो बख्शी थी हमें एक ही धरती,
हमने कहीं भारत, कहीं इरान बनाया. 
जो तोड़ दे हर बंद, वो तूफ़ान बनेगा.
इंसान की औलाद है इंसान बनेगा. 

नफरत जो सिखाये वो धर्म तेरा नहीं है,
इंसान को रौंदे वो क़दम तेरा नहीं है.
कुरान न हो जिसमें वो मंदिर नहीं तेरा,
गीता न हो जिसमें वो हरम तेरा नहीं है.
तू अम्न और सुलह का अर्मान बनेगा. 
इंसान की औलाद है इंसान बनेगा. 

ये दीन के ताजिर', ये वतन बेचने वाले,
इंसानों की लाशों के कफन बेचने वाले.
ये महलों में बैठे हुए कातिल, ये लुटेरे,
काँटों के इवज़ रूहे चमन बेचने वाले.
तू उनके लिए मौत का सामान बनेगा. 
इंसान की औलाद है इंसान बनेगा.

_________________ शब्दार्थ __________________
| तक्सीम=बांटना | ताजिर=व्यापारी | 
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