पढने और संकलन का शौक ही इस ब्लॉग का आधार है... महान कवि, शायर, रचनाकार और उनकी उत्कृष्ट रचनाएँ.... हमारे मित्र... हमारे गुरु... हमारे मार्गदर्शक... निश्चित रूप से हमारी बहुमूल्य धरोहर... विशुद्ध रूप से एक अव्यवसायिक संकलन जिसका एक मात्र और निःस्वार्थ उद्देश्य महान काव्य किवदंतियों के अप्रतिम रचना संसार को अधिकाधिक काव्य रसिकों तक पंहुचाना है... "काव्य मंजूषा"

Friday, 27 July 2012

काकुलें

कभी बन संवर के जो आ गए, तो बहारे हुस्न दिखा गए. 
मेरे दिल को दाग़ लगा गए, ये नया शिगूफ़ा खिला गए. 

कोई क्यों किसी का लुभाए दिल कोई क्यों किसी से लगाए दिल, 
जो वो बेचते थे दवाये दिल वो दुकान अपनी बढ़ा गए. 

मेरे पास आते थे दम-ब-दम वो जुदा न होते थे एक दम,
ये दिखाया चर्ख' ने क्या सितम कि मुझी से आँखें चुरा गए. 

बंधें क्यूँ न आंसुओं कि झडी, कि ये हसरत उनके गले पडी,
वे जो काकुलें' थीं बड़ी-बड़ी, वो उन्हीं के पेंच में आ गए. 

यही शौक़ था हमें दम-ब-दम, कि बहार देखेंगे अब के हम,
ज्यूँ ही छूटे कैदे कफ़स से हम तो सुना खिजाँ' के दिन आ गए.

_____________शब्दार्थ_____________
चर्ख=आकाश | काकुलें=जुल्फ़ | खिजाँ=पतझड़ |
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