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Monday, 30 July 2012

चाँद और कवि

रात यूँ कहने लगा मुझसे गगन का चाँद,
आदमी भी क्या अनोखा जीव होता है.
उलझनें अपनी बनाकर आप ही फंसता, 
और फिर बेचैन हो जगता न सोता है. 

जानता है तू कि मैं कितना पुराना हूँ?
मैं चुका हूँ देख मनु को जनमते मरते;
और लाखों बार तुझ-से पागलों को भी,
चांदनी में बैठ स्वप्नों पर सही करते. 

आदमी का स्वप्न? है वह बुलबुला जल का,
आज बनता और कल फिर फूट जाता है;
किन्तु, तो भी धन्य; ठहरा आदमी ही तो!
बुलबुलों से खेलता, कविता बनाता है. 

मैं न बोला, किन्तु मेरी रागिनी बोली,
चाँद! फिर से देख, मुझ को जानता है तू?
स्वप्न मेरे बुलबुले है? है यही पानी?
आग को भी क्या नहीं पहचानता है तू?

मैं न वह तो स्वप्न पर केवल सही करते,
आग में उसको गला लोहा बनाती हूँ;
और उस पर नींव रखती हूँ नए घर की,
इस तरह, दीवार फौलादी उठाती हूँ.

मनु नहीं, मनु-पुत्र है यह सामने, जिस की
कल्पना की जीभ में भी धार होती है;
बाण ही होते विचारों के नहीं केवल,
स्वप्न के भी हाथ में तलवार होती है. 

स्वर्ग के सम्राट को जाकर खबर कर दे,
"रोज ही आकाश चढ़ते जा रहे हैं ये;
रोकिये, जैसे बने, इन स्वप्नवालों को,
स्वर्ग की ही और बढ़ते जा रहे हैं ये. 
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