पढने और संकलन का शौक ही इस ब्लॉग का आधार है... महान कवि, शायर, रचनाकार और उनकी उत्कृष्ट रचनाएँ.... हमारे मित्र... हमारे गुरु... हमारे मार्गदर्शक... निश्चित रूप से हमारी बहुमूल्य धरोहर... विशुद्ध रूप से एक अव्यवसायिक संकलन जिसका एक मात्र और निःस्वार्थ उद्देश्य महान काव्य किवदंतियों के अप्रतिम रचना संसार को अधिकाधिक काव्य रसिकों तक पंहुचाना है... "काव्य मंजूषा"

Thursday, 12 July 2012

तगाफुल शिआर

जो पहले दिन से ही दिल का कहा न करते हम. 
तो अब यह लोगों की बातें सुना न करते हम. 

अगर न दाम' में जुल्फ़े-सियह के आ जाते,
तो यूँ ख़राब-ओ-परीशां रहा न करते हम. 

न भरते दम जो किसी शोला-रू की ख्वाहिश का, 
तो ठंडी सांस हमेशा भरा न करते हम. 

अगर न आँख तगाफुल-शिआर' से लगती,
तो बैठे बैठे यूँ चौंक उठा न करते हम. 

उस आफ़ते-दिल-ओ-जाँ पे अगर न मर जाते, 
तो अपने मरने की हरदम दुआ न करते हम. 

अगर न हंसना हंसाना किसी का भा जाता, 
तो बात बात पे यूँ रो दिया न करते हम.

______________ शब्दार्थ_________________
दाम=जाल | जुल्फे-सियह=काले बाल | शोला-रू=आग की लपटों जैसा | तगाफुल शिआर=लापरवाह |
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