पढने और संकलन का शौक ही इस ब्लॉग का आधार है... महान कवि, शायर, रचनाकार और उनकी उत्कृष्ट रचनाएँ.... हमारे मित्र... हमारे गुरु... हमारे मार्गदर्शक... निश्चित रूप से हमारी बहुमूल्य धरोहर... विशुद्ध रूप से एक अव्यवसायिक संकलन जिसका एक मात्र और निःस्वार्थ उद्देश्य महान काव्य किवदंतियों के अप्रतिम रचना संसार को अधिकाधिक काव्य रसिकों तक पंहुचाना है... "काव्य मंजूषा"

Saturday, 30 June 2012

एकांत संगीत २०

कितना अकेला आज मैं !

संघर्ष में टूटा हुआ,
दुर्भाग्य से लूटा हुआ, 
परिवार से छूटा हुआ? कितना अकेला आज मैं!
कितना अकेला आज मैं !

भटका हुआ संसार में,
अकुशल जगत व्यवहार में,
असफल सभी व्यापार में, कितना अकेला आज मैं!
कितना अकेला आज मैं !

खोया सभी विश्वास है,
भूला सभी उल्लास है,
कुछ खोजती हर सांस है, कितना अकेला आज मैं!
कितना अकेला आज मैं !
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