पढने और संकलन का शौक ही इस ब्लॉग का आधार है... महान कवि, शायर, रचनाकार और उनकी उत्कृष्ट रचनाएँ.... हमारे मित्र... हमारे गुरु... हमारे मार्गदर्शक... निश्चित रूप से हमारी बहुमूल्य धरोहर... विशुद्ध रूप से एक अव्यवसायिक संकलन जिसका एक मात्र और निःस्वार्थ उद्देश्य महान काव्य किवदंतियों के अप्रतिम रचना संसार को अधिकाधिक काव्य रसिकों तक पंहुचाना है... "काव्य मंजूषा"

Saturday, 30 June 2012

एकांत संगीत १९

प्रार्थना मत कर, मत कर, मत कर !

युद्धक्षेत्र में दिखला भुजबल,
रहकर अविजित, अविचल प्रतिपल,
मनुज पराजय के स्मारक हैं, मठ, मस्जिद, गिरजाघर !
प्रार्थना मत कर, मत कर, मत कर !

मिला नहीं जो स्वेद बहाकर,
निज लोहू में भीग नहाकर,
वर्जित उसको, जिसे ध्यान है जग में कहलाये नर !
प्रार्थना मत कर, मत कर, मत कर !

झुकी हुई अभिमानी गर्दन,
बंधे हाथ, नत-निष्प्रभ लोचन,
यह मनुष्य का चित्र नहीं है, पशु का है रे कायर !
प्रार्थना मत कर, मत कर, मत कर !
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