पढने और संकलन का शौक ही इस ब्लॉग का आधार है... महान कवि, शायर, रचनाकार और उनकी उत्कृष्ट रचनाएँ.... हमारे मित्र... हमारे गुरु... हमारे मार्गदर्शक... निश्चित रूप से हमारी बहुमूल्य धरोहर... विशुद्ध रूप से एक अव्यवसायिक संकलन जिसका एक मात्र और निःस्वार्थ उद्देश्य महान काव्य किवदंतियों के अप्रतिम रचना संसार को अधिकाधिक काव्य रसिकों तक पंहुचाना है... "काव्य मंजूषा"

Saturday, 23 June 2012

ग़म-ए-पिन्हा

तुम इतना जो मुस्कुरा रहे हो. 
क्या ग़म है जिसको छुपा रहे हो 

आँखों में नमी, हंसी लबों पर, 
क्या हाल है, क्या दिखा रहे हो. 

बन जायेंगे जहर पीते पीते, 
ये अश्क़ जो पीते जा रहे हो. 

जिन ज़ख्मों को वक़्त भर चला है, 
तुम क्यों उन्हें छेड़े जा रहे हो. 

रेखाओं का खेल है मुक़द्दर,
रेखाओं से मात खा रहे हो. 

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