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Saturday, 23 June 2012

बवाले दोश

दीवानगी से दोश' पे जुन्नार' भी नहीं. 
यानी हमारे जेब में इक तार भी नहीं. 

दिल को नियाज़े हसरते दीदार' कर चुके, 
देखा तो हममें ताकते दीदार' भी नहीं. 

बेइश्क' उम्र कट नहीं सकती है और यां, 
ताकत बक़द्रे' लज्ज़ते आज़ार' भी नहीं. 

शोरिदगी' के हाथ में है सर बवाले दोश', 
सहरा' में ऐ खुदा कोई दीवार भी नहीं.

मिलना तेरा अगर नहीं आसां तो सहल है, 
दुश्वार' तो यही है कि दुश्वार भी नहीं. 

डर नालाहाए ज़ार' से मेरे खुदा को मान, 
आखिर नवा-ए-मुर्गे' गिरिफ्तार' भी नहीं. 

इस सादगी पे कौन न मर जाए ऐ खुदा, 
लड़ते हैं और हाथ में तलवार भी नहीं. 

देखा असद को खल्वतो जलवत' में बारहा, 
दीवाना गर नहीं है तो हुशियार भी नहीं.

_____________________शब्दार्थ_____________________
दोश = कंधा | जुन्नार = यज्ञोपवित | नियाजे हसरते दीदार = मुलाक़ात और देखने कि इच्छा | ताक़ते दीदार = देखने कि ताक़त | बेइश्क = बिना मुहब्बत के | ताकत बक़द्रे लज्ज़ते आज़ार = दुखों का स्वाद लेने कि ताक़त | शोरिदगी = जूनून | बवाले दोश = कंधे कि मुसीबत | सहरा = रेगिस्तान | नालाहाए जार = आर्तनाद | नवा-ए-मुर्ग = पक्षी कि आवाज़ | गिरिफ्तार = क़ैद | खल्वतो जलवत = एकांत और महफ़िल |
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