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Wednesday, 20 June 2012

सराब

शोर यूँ ही न परिंदों ने मचाया होगा. 
कोई जंगल की तरफ शहर से आया होगा. 

पेड़ के काटने वालों को ये मालूम तो था, 
जिस्म जल जायेंगे जब सर पे न साया होगा. 

बानी-ए-जश्न-ए-बहारां' ने ये सोचा भी नहीं, 
किसने काँटों को लहू अपना पिलाया होगा. 

अपने जंगल से जो घबरा के उड़े थे प्यासे,
ये सराब' उनको समंदर नजर आया होगा. 

बिजली के तार पे बैठा हुआ तनहा पंछी,
सोचता है की वो जंगल तो पराया होगा.

______________शब्दार्थ ______________
बानी-ए-जश्ने-बहारां = बसंतोत्सव शुरू करने वाला | सराब = मरीचिका |
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