पढने और संकलन का शौक ही इस ब्लॉग का आधार है... महान कवि, शायर, रचनाकार और उनकी उत्कृष्ट रचनाएँ.... हमारे मित्र... हमारे गुरु... हमारे मार्गदर्शक... निश्चित रूप से हमारी बहुमूल्य धरोहर... विशुद्ध रूप से एक अव्यवसायिक संकलन जिसका एक मात्र और निःस्वार्थ उद्देश्य महान काव्य किवदंतियों के अप्रतिम रचना संसार को अधिकाधिक काव्य रसिकों तक पंहुचाना है... "काव्य मंजूषा"

Tuesday, 19 June 2012

एकांत संगीत ४

            मैं जीवन में कुछ कर न सका. 

            जग में अंधियाला छाया था, 
            मैं ज्वाला लेकर आया था,
मैनें जल कर दी आयु बिता, पर जगती का तम हर न सका. 
            मैं जीवन में कुछ कर न सका. 

            अपनी ही आग बुझा लेता 
            तो जी को धैर्य बंधा लेता, 
मधु का सागर लग्राता था, लघु प्याला भी मैं भर न सका. 
            मैं जीवन में कुछ कर न सका. 

            बिता अवसर क्या आयेगा,
            मन जीवन भर पछतायेगा,
मरना तो होगा ही मुझको, जब मरना था तब मर न सका. 
            मैं जीवन में कुछ कर न सका. 

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