पढने और संकलन का शौक ही इस ब्लॉग का आधार है... महान कवि, शायर, रचनाकार और उनकी उत्कृष्ट रचनाएँ.... हमारे मित्र... हमारे गुरु... हमारे मार्गदर्शक... निश्चित रूप से हमारी बहुमूल्य धरोहर... विशुद्ध रूप से एक अव्यवसायिक संकलन जिसका एक मात्र और निःस्वार्थ उद्देश्य महान काव्य किवदंतियों के अप्रतिम रचना संसार को अधिकाधिक काव्य रसिकों तक पंहुचाना है... "काव्य मंजूषा"

Monday, 2 July 2012

ग़ज़ल २

शाम के सांवले चेहरे को निखारा जाए. 
क्यों न सागर' से कोई चाँद उभारा जाए. 

रास आया नहीं तस्कीन' का साहिल' कोई,
फिर प्यास को दरिया में उतारा जाए.

अब मेरे शहर में आयेगी सवारी किसकी, 
अब किस उम्मीद पर राहों को संवारा जाए.

महरबां तेरी नज़र तेरी अदाएं कातिल,
तुझ को किस नाम से पुकारा जाए.

मुझ को डर है तेरे वादे पे भरोसा करके,
मुफ्त में यह दिले खुशफहम' न मारा जाए.

______________शब्दार्थ_________________
| सागर=जाम | तस्कीन=दिलासा/ढाढस | साहिल=किनारा | दिले खुशफहम=भ्रम पालने वाला |
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