पढने और संकलन का शौक ही इस ब्लॉग का आधार है... महान कवि, शायर, रचनाकार और उनकी उत्कृष्ट रचनाएँ.... हमारे मित्र... हमारे गुरु... हमारे मार्गदर्शक... निश्चित रूप से हमारी बहुमूल्य धरोहर... विशुद्ध रूप से एक अव्यवसायिक संकलन जिसका एक मात्र और निःस्वार्थ उद्देश्य महान काव्य किवदंतियों के अप्रतिम रचना संसार को अधिकाधिक काव्य रसिकों तक पंहुचाना है... "काव्य मंजूषा"

Saturday, 30 June 2012

एकांत संगीत १७

अग्नि देश से आता हूँ मैं !

झुलस गया तन, झुलस गया मन,
झुलस गया कवि कोमल जीवन,
किन्तु अग्नि-वीणा पर अपने दग्ध कंठ से गाता हूँ मैं !
अग्नि देश से आता हूँ मैं !

स्वर्ण शुद्ध कर लाया जग में,
उसे लुटाता आया मग में,
दीनों का मैं वेश किये, पर दीन नहीं हूँ, दाता हूँ मैं !
अग्नि देश से आता हूँ मैं !

तुमने अपने कर फैलाए, 
लेकिन देर बड़ी कर आये,
कंचन तो लुट चुका, पथिक, अब लूटो राख लुटाता हूँ मैं !
अग्नि देश से आता हूँ मैं !
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