पढने और संकलन का शौक ही इस ब्लॉग का आधार है... महान कवि, शायर, रचनाकार और उनकी उत्कृष्ट रचनाएँ.... हमारे मित्र... हमारे गुरु... हमारे मार्गदर्शक... निश्चित रूप से हमारी बहुमूल्य धरोहर... विशुद्ध रूप से एक अव्यवसायिक संकलन जिसका एक मात्र और निःस्वार्थ उद्देश्य महान काव्य किवदंतियों के अप्रतिम रचना संसार को अधिकाधिक काव्य रसिकों तक पंहुचाना है... "काव्य मंजूषा"

Friday, 29 June 2012

एकांत संगीत १३

तुम्हारा लौह चक्र आया !

कुचल चला अचला के वन घन,
बसे नगर सब निपट निठुर बन, 
चूर हुई चट्टान, क्षार पर्वत की दृढ़ काया !
तुम्हारा लौह चक्र आया !

अगणित ग्रह-नक्षत्र गगन के,
टूट पिसे, मरू-सिकता-कण के,
रूप उड़े, कुछ धुंआ-धुंआ सा अम्बर में छाया !
तुम्हारा लौह चक्र आया !

तुमने अपना चक्र उठाया,
अचरज से निज मुख फैलाया,
दन्त-चिह्न केवल मानव का जब उस पर आया !
तुम्हारा लौह चक्र आया ! 
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