पढने और संकलन का शौक ही इस ब्लॉग का आधार है... महान कवि, शायर, रचनाकार और उनकी उत्कृष्ट रचनाएँ.... हमारे मित्र... हमारे गुरु... हमारे मार्गदर्शक... निश्चित रूप से हमारी बहुमूल्य धरोहर... विशुद्ध रूप से एक अव्यवसायिक संकलन जिसका एक मात्र और निःस्वार्थ उद्देश्य महान काव्य किवदंतियों के अप्रतिम रचना संसार को अधिकाधिक काव्य रसिकों तक पंहुचाना है... "काव्य मंजूषा"

Wednesday, 27 June 2012

परिचय

सलिल-कण हूँ कि पारावार हूँ मैं?
स्वयं छाया, स्वयं आधार हूँ मैं. 
बंधा हूँ, स्वप्न हूँ, लघु वृत्त में हूँ, 
नहीं तो व्योम का विस्तार हूँ मैं. 

समाना चाहती जो बीन-उर में. 
विकल वह शून्य की झंकार हूँ मैं. 
भटकता, खोजता हूँ ज्योति मन में,
सुना है ज्योति का आगार हूँ मैं. 

जिसे निशि खोजती तारे जलाकर,
उसी का कर रहा अभिसार हूँ मैं.
जनमकर मर चुका सौ बार लेकिन,
अगम का पा सका क्या पार हूँ मैं?

कली की पंखडी पर ओस कण में,
रंगीले स्वप्न का संसार हूँ मैं.
मुझे क्या आज ही या कल झडूं मैं?
सुमन हूँ, एक लघु उपहार हूँ मैं. 

जलन हूँ, दर्द हूँ दिल कि कसक हूँ,
किसी का हाय! खोया प्यार हूँ मैं. 
गिरा हूँ भूमि पर नंदन-विपिन से,
अमर-तरु का सुमन सुकुमार हूँ मैं.

मुझे क्या गर्व हो अपनी विभा का?
चिता की धूलि कण हूँ, क्षार हूँ मैं.
पता मेरा तुम्हें मिटटी कहेगी,
समा जिस में चुका सौ बार हूँ मैं. 

सुनूँ क्या सिन्धु! मैं गर्जन तुम्हारा?
स्वयं युघ-धर्म का हुंकार हूँ मैं.
कठिन निर्घोष हूँ भीषण अशनि का,
प्रलय-गांडीव की टंकार हूँ मैं.

दबी सी आग हूँ भीषण क्षुधा की,
दलित का मौन हाहाकार हूँ मैं.
सजग संसार, तू निज को संभाले,
प्रलय का क्षुब्ध पारावार हूँ मैं. 

बंधा हूँ, तूफ़ान हूँ, चलना मना है,
बंधी उद्दाम निर्झर धार हूँ मैं. 
कहूँ क्या, कौन हूँ? क्या आग मेरी?
बंधी है लेखनी, लाचार हूँ मैं. 

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