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Friday, 22 June 2012

एकांत संगीत ९

            तब रोक न पाया मैं आंसू. 

            जिसके पीछे पागल होकर, 
            मैं दौड़ा अपने जीवन भर, 
जब मृगजल में परिवर्तित हो, मुझ पर मेरा अरमान हंसा!
            तब रोक न पाया मैं आंसू. 

            जिसमें अपने प्राणों को भर,
            कर देना चाहा अजर-अमर,
जब विस्मृति के पीछे छिपकर, मुझ पर मेरा मधुगान हंसा!
            तब रोक न पाया मैं आंसू. 

            मेरे पूजन-आराधन को,
            मेरे सम्पूर्ण समर्पण को,
जब मेरी कमजोरी कहकर, मेरा पूजित पाषाण हंसा!
            तब रोक न पाया मैं आंसू. 

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