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Thursday, 21 June 2012

अजनबी से हम

ठानी थी दिल में अब न मिलेंगे किसी से हम. 
पर क्या करें के हो गए नाचार' जी से हम. 

बे-रोये मिस्ले-अब्र' न निकला गुबारे-दिल,
कहते थे उनको बर्के-तबस्सुम' हंसी से हम.

मुह देखने से पहले भी किस दिन वह साफ़ थे, 
बे-वज्ह क्यों गुबार' रखें आरसी' से हम. 

क्या दिल को ले गया कोई बेगाना-आशना' 
क्यों अपने जी को लगते हैं कुछ अजनबी से हम. 

साहब ने इस गुलाम को आजाद कर दिया, 
लो बंदगी कि छूट गए बंदगी' से हम.

_________________शब्दार्थ _____________________
नाचार = बेबस | मिस्लेअब्र = घटाओं कि तरह | बर्के तबस्सुम = जिसकी मुस्कान बिजली कि तरह हो | गुबार = मैल | आरसी = आईना | बेगाना-आशना = अनजान मित्र | बंदगी = चाकरी |
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