पढने और संकलन का शौक ही इस ब्लॉग का आधार है... महान कवि, शायर, रचनाकार और उनकी उत्कृष्ट रचनाएँ.... हमारे मित्र... हमारे गुरु... हमारे मार्गदर्शक... निश्चित रूप से हमारी बहुमूल्य धरोहर... विशुद्ध रूप से एक अव्यवसायिक संकलन जिसका एक मात्र और निःस्वार्थ उद्देश्य महान काव्य किवदंतियों के अप्रतिम रचना संसार को अधिकाधिक काव्य रसिकों तक पंहुचाना है... "काव्य मंजूषा"

Tuesday, 19 June 2012

एकांत संगीत ३

          कोई नहीं , कोई नहीं! 
               
          यह भूमि है हाला भरी
          मधु पात्र - मधुबाला भरी 
ऐसा बुझा जो पा सके मेरे ह्रदय की प्यास को-
          कोई नहीं कोई नहीं!

          सुनता समझता है गगन,
          वन के विहंगों के वचन,
ऐसा समझ जो पा सके मेरे ह्रदय - उच्छ्वास को-
          कोई नहीं, कोई नहीं. 

          मधुऋतु समीरण चल पडा, 
          वन ले नये पल्लव खडा, 
ऐसा फिरा जो ला सके मेरे गये विश्वास को- 
          कोई नहीं, कोई नहीं. 

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