पढने और संकलन का शौक ही इस ब्लॉग का आधार है... महान कवि, शायर, रचनाकार और उनकी उत्कृष्ट रचनाएँ.... हमारे मित्र... हमारे गुरु... हमारे मार्गदर्शक... निश्चित रूप से हमारी बहुमूल्य धरोहर... विशुद्ध रूप से एक अव्यवसायिक संकलन जिसका एक मात्र और निःस्वार्थ उद्देश्य महान काव्य किवदंतियों के अप्रतिम रचना संसार को अधिकाधिक काव्य रसिकों तक पंहुचाना है... "काव्य मंजूषा"

Monday, 18 June 2012

एकांत संगीत १

             अब मत मेरा निर्माण करो.

             तुमने न बना मुझको पाया.
             युग युग बीते मैं घबराया.
भूलो मेरी विह्वलता को, निज लज्जा को तो ध्यान करो.
             अब मत मेरा निर्माण करो.

             इस चक्की पर खाते चक्कर.
             मेरा तन-मन-जीवन जर्जर.
हे कुम्भकार! मेरी मिटटी को, और न अब हैरान करो.
             अब मत मेरा निर्माण करो.

             कहने की सीमा होती है. 
             सहने की सीमा होती है.
कुछ मेरे भी वश में, मेरा कुछ सोच समझ अपमान करो.
             अब मत नेरा निर्माण करो.

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