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Wednesday, 13 June 2012

दुर्र-ए-नायाब

जाते थे सुबह रह गये बेताब देखकर. 
ताला' हमारे चौंक पड़े ख्वाब देखकर. 

पाया जो दुश्मनों ने तेरे पास ऐतबार, 
आँखें चुराते हैं मुझे अहबाब' देखकर. 

तौबा कहाँ कदूरते-बातिन' के होश थे, 
गश हो गया मैं रंग-मये-नाब' देखकर. 

रोये वह मेरे हाल पर हैरान क्यों न हो,
आँखें से खुल गईं दुर्र-ए-नायाब' देखकर.

है है तमीज इश्को हवस आज तक नहीं, 
वह छिपते फिरते हैं मुझे बेताब देखकर. 

'मोमिन' यह ताब' क्या कि तकाजा-ए-जलवा' हो,
काफिर हुआ मैं दीन' के आदाब' देखकर. 

_____________________________शब्दार्थ _______________________________
ताला=भाग्य | ऐतबार=भरोसा | अहबाब=मित्रगण | कदूरते-बातिन=भीतरी अदावत | रंग-मये-नाब=शराब का रंग | दुर्र-ए-नायाब=दुर्लभ मोती | इसको-हवस=प्रेम और कामना | ताब=ताकत | तकाजा-ए-जलवा=दर्शन कि चाहत | दीन=धर्म | आदाब=शिष्टाचार
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